दलदल में फंसी स्वास्थ व्यवस्था

बिहार में दिमाग़ी बुखार से क़रीब 100 बच्चों की मौत हो चुकी है। दिन ब दिन यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों में मुज़फ़्फ़रपुर की बदहाल व्यवस्था की तस्वीर पेश की जा रही है।

वहीं दूसरी तरफ़ कोलकाता में जूनियर डॉक्टरों के साथ हिंसा ने पूरे देश के डॉक्टरों को आंदोलनरत कर दिया है और एम्स जैसे संस्थानों में इलाज प्रभावित हो रहा है। अस्पतालों की कमी, बिना डॉक्टरों का वॉर्ड, बिना प्रशिक्षण वाला स्टाफ़ और फ़ंड का बड़ा संकट है।

ऐसी कई और समस्याओं से जूझ रहा भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र दशकों से दलदल में धंसता जा रहा है। भारत दावा करता है कि जियोपॉलिटिकल सूची में देश की रैंकिंग बढ़ती जा रही है लेकिन यहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत उसके इस दावे को शक में दायरे में खड़ा करते हैं। भारत दावा करता है कि जियोपॉलिटिकल सूची में देश की रैंकिंग बढ़ती जा रही है लेकिन यहां स्वास्थ्य सेवाओं की हालत उसके इस दावे को शक में दायरे में खड़ा करते हैं।

कई गांवों में हेल्थ प्रोफ़ेशनल के मामले में भारत कई अफ्रीकी देशों से पीछे हैं। स्वास्थ्य सेवा पर भारत का कम खर्च सालों से जानकारों के लिए एक चिंता का विषय है। दुनिया की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत अपनी जीडीपी का महज 1.5 फ़ीसदी ही स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करता है, जो दुनिया के सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है।

भारत ने अपने अंतरिम बजट में रक्षा के लिए जीडीपी का 10.6 प्रतिशत ख़र्च करने की बात कही जो स्वास्थ्य के मुकाबले पांच गुना ज़्यादा है। साल 2017 में भाजपा सरकार ने यह वादा किया था कि 2025 तक देश की कुल जीडीपी का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य बजट पर खर्च किया जाएगा।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना सरकार के लिए चुनौती है, लेकिन एक और चुनौती जो अभी मोदी सरकार के सामने विशालकाय आकार लिए खड़ी है और वह है देश की चरमरा चुकी स्वास्थ्य व्यवस्था।

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पत्रकारिता से भयभीत राजसत्ता!!

किसी ने ठीक कहा है कि जब पूंजी का दबदबा, आत्मग्रस्तता या आत्ममोह, धार्मिक आस्था और प्रतीकवाद अपने चरम पर हों तब सामाजिक न्याय व मानव अधिकारों के आंदोलन हाशिये पर जाने लगते हैं या निस्तेज पड़ जाते हैं।

मीडिया-आज़ादी के पर कतरने के लिए क़ानून लाने की बात की जा रही है।मुख्यमंत्री की दलील है कि उनके और मंत्रियों के ख़िलाफ़ अनाप-शनाप लिखा जा रहा है।

इससे पहले मोदी सरकार के प्रथमकाल (2014 -19) के दौरान भाजपा और सरकार से असहमति रखनेवाले पत्रकारों को ‘राष्ट्र विरोधी’ तक कहा गया।

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तरप्रदेश की पुलिस ने दिल्ली-नोएडा क्षेत्र से तीन मीडिया कर्मियों को गिरफ़्तार किया। उन्हें 14 दिनों के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। और एक पत्रकार के ख़िलाफ़ उत्तरप्रदेश में ही एफ़आईआर दर्ज करा दी गई है। देश के संपादकों की सबसे बड़ी संस्था ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया’ ने गिरफ़्तारियों की कड़ी निंदा की है और पुलिस की कार्रवाई को क़ानून का निरकुंश दुरूपयोग क़रार दिया है।

मुख़्तसर से, इन पत्रकारों का अपराध यह है कि इन्होनें महंत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध कथित रूप से ऐसी सामग्री प्रसारित की है जिससे उनके सम्मान को ठेस पहुँचती है। सामग्री कितनी असम्मानजनक या अशोभनीय है, इसका फ़ैसला तो जांच और कोर्ट करेगा। पर इतना तय है कि राजसत्ता की प्रतिनिधि पुलिस की इस कार्रवाई से प्रेस या मीडिया की स्वतंत्रता ज़रूर ख़तरे में दिखाई दे रही है। बड़े फलक पर सोचें तो नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संभावित ख़तरों से घिरी दिखाई दे रही है।

मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने तो उन पत्रकारों को खुली धमकी तक दे दी है जो मंत्रियों के ख़िलाफ़ लिखते हैं।

धर्म की राजनीति भड़का रहीं ममता

नई मोदी सरकार की ये पहली नीति आयोग की बैठक है जिसमें पानी के संकट और कृषि जैसे मुद्दों पर चर्चा संभव है लेकिन ममता बनर्जी ने यह कहते हुए इस बैठक से किनारा कर लिया है कि यह बैठक उनके लिए ‘निरर्थक’ है।

ममता बनर्जी 30 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट के शपथ ग्रहण समारोह में भी शामिल नहीं हुई थीं। एक बात बेहद साफ़ है कि ममता बनर्जी एक राजनेता हैं, वो कभी आर्थिक एजेंडा को सामने नहीं रखती हैं. इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि वह जब से राज्य की मुख्यमंत्री हैं तब से अब तक कभी चेंबर ऑफ़ कॉमर्स की एक भी बैठक में शामिल नहीं हुई. इंडस्ट्रीयल और आर्थिक मामलों से जुड़े एजेंडे वाली बैठक में शामिल नहीं होती। ममता बनर्जी अपना राजनीतिक एजेंडा लेकर चलती हैं। वो यह नहीं देखतीं कि इससे राज्य का भला हो रहा है या नहीं। वो वही करती हैं जो उनके राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल होता है।

ममता बनर्जी केंद्र में एनडीए का हिस्सा रही चुकी हैं। वाजपेयी सरकार में वह देश की रेलमंत्री भी रही हैं। लेकिन आज वह बीजेपी की सबसे बड़ी विरोधियों में से एक हैं। उन्होंने हाल ही में फ़ेसबुक पर एक ब्लॉग लिखकर बीजेपी की विचारधारा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बीजेपी राजनीति में धर्म मिलाती है। इस नफ़रत की राजनीति को बंगाल में नहीं चलने देंगे।

जय श्रीराम का नारा लगाने के आरोप में सात लोगों को हिरासत में लिया गया। इस घटना का एक वीडियो सामने आया जिसमें नारे लगाने वालों को वह ”क्रिमिनल” कह रही हैं। आखिर इन नारों पर वह इतनी उग्र क्यों हो जाती हैं?

ममता जय श्री राम के नारे पर जिस तरह प्रतिक्रिया दे रही हैं ये एक मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देता। बेहतर होता कि वह इस मुद्दे को इतना तूल नहीं देती। आज बंगाल में वह खुद ऐसा करके धर्म की राजनीति भड़का रही हैं।

सियासी अखाड़े में फतह की तरफ एक और कदम

भारत के शहीद हर जवान के लिए प्रत्येक भारतीय के सीने में जो आग धधक रही थी उसे थोड़ी राहत मिली है। अगर पुरानी बाते छोड़ दे तो अभी फरवरी में ही हमारे सीआरपीएफ के 40 जवान छले गए और उन्हें मार दिया गया। जिससे पूरा देश तिलमिलाया हुआ था, आतंकी मसूद अजहर को उसके कर्मों की सजा देने के लिए।

अब 75 दिन बाद भारत को कामयाबी मिल गई है। आतंकी मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के खिलाफ ये कार्रवाई की है।मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा समिति के सदस्य देशों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस लगातार कोशिश कर रहे थे, लेकिन बार-बार चीन इस पर वीटो लगा दे रहा था. करीब 10 सालों में चीन 4 बार वीटो लगा चुका था।

2009, 2016, 2017 और फरवरी, 2019 में चीन ने प्रस्ताव पर वीटो लगाया था, लेकिन उसने अंतराष्ट्रीय स्तर पर दबाव पड़ने से चीन ने वीटो हटा दिया और इसके बाद मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कर दिया गय।

मसूद अजहर पर कार्रवाई होने के बाद बीजेपी ने कहा कि ये आतंक के खिलाफ पीएम मोदी की बड़ी जीत है।

और अगर इसे एक सियासती नजरिए से देखा जाए तो मोदी सरकार में ही चुनाव के समय में आतंकवाद पर इतनी बड़ी करवाई कहीं न कहीं प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में है। और यह कहने में बिल्कुल संकोच नहीं होगा कि आतंकवाद पर इतनी बड़ी जीत मोदी सरकार के कारण ही मुमकिन हुआ है। ये जीत बेशक हम सबके लिए काबिल ए जश्न है लेकिन मोदी सरकार ने चुनावी मैदान में फतह की ओर एक और कदम बढ़ा लिया है।

क्यों अनसुलझा पड़ा है अज़हर का मामला?

जैश ए मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित कराने की भारत की मुहिम को एक बार फिर बल मिलते दिख रहा है।

मार्च 2019 में मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में लाया गया था। जिसको अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों का समर्थन हासिल था। लेकिन चीन के वीटो के कारण यह प्रस्ताव गिर गया था।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ था जब चीन ने मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सूची में शामिल होने से रोकने के लिए अड़ंगा डाला हो इससे पहले भी वह कई मर्तबा यह कर चुका है।

लेकिन यह देखना चाहिए कि ब्रिटेन चीन को राज़ी करने के लिए क्या दबाव डाल रहा है? चीन पर कोई दबाव नहीं है। एक तरह से चीन चरमपंथी की मदद कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कोई दबाव चीन पर नहीं पड़ रहा है।इस कारण ब्रिटेन के उच्चायुक्त के बयान को केवल बयान की तरह देखा जाना चाहिए जो भारत के हक़ में है।

इस बयान से ब्रिटेन और पाकिस्तान के संबंधों पर कुछ असर हो सकता है जो भारत के लिए फ़ायदेमंद है। लेकिन सवाल यह है कि भारत में ब्रिटेन के उच्चायुक्त के हालिया बयान के क्या मायने निकाले जाने चाहिए? क्या चीन को लेकर भारत की कोई कूटनीतिक रणनीति चल रही है? क्या ब्रिटेन भारत के लिए चीन को राज़ी करने जा रहा है?

ब्रिटेन से अधिक अमरीका चाहता है कि मसूद अज़हर जैसे लोग अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित हों। चीन अगर रज़ामंदी दे देता है तो यह आराम से हो जाएगा।

और बड़ी बात यह है कि मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने से भारत को बहुत बड़ा लाभ नहीं होगा क्योंकि किसी मीडिया हाउस ने यह बात सामने रखी है कि मसूद अज़हर अंतरराष्ट्रीय यात्रा नहीं करते, न ही अंतरराष्ट्रीय फ़ंड जुटाते हैं। इससे भारत की एक कूटनीतिक जीत होगी जिसका सिर्फ़ चुनाव में इस्तेमाल हो सकता है।

विदेशी दिलों पर भी फतह

रूस ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ़ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल’ से सम्मानित किया है।

मोदी को यह सम्मान दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को बढ़ावा देने में असाधारण योगदान और दोनों देशों के लोगों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध को बढ़ावा देने के लिए दिया है।

इस पुरस्कार से सम्मानित होने वालों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति हेदार अलीयेव और कज़ाकिस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव को सम्मानित किया जा चुका है।

इसी महीने संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई ने भी मोदी को अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ज़ायेद मेडल से सम्मानित किया है।

क्राउन प्रिंस जो यूएई की सशस्त्र सेना के डिप्टी सुप्रीम कमांडर भी हैं, उन्होंने कहा, “मोदी ने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने और रणनीतिक संबंधों को व्यापक बनाने में मोदी ने प्रमुख भूमिका निभाई है।”

पिछले साल फ़रवरी में प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई की दूसरी बार यात्रा की थी और क्राउन प्रिंस के साथ कई मुद्दों पर बात की थी।बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने ऊर्जा क्षेत्र, श्रम शक्ति और वित्तीय सेवाओं में संबंध मजबूत करने के लिए हस्ताक्षर किए थे।

मोदी के कार्यकाल के दौरान अफ़ग़ानिस्तान ने 2016 में उन्हें अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान अमानुल्लाह ख़ान पुरस्कार दिया.2018 में फिलिस्तीन ने ‘ग्रैंड कॉलर ऑफ़ द स्टेट ऑफ़ फिलिस्तीन’ से और दक्षिण कोरिया में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए सियोल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया था।2018 में ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने उन्हें अपना सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार ‘चैंपियंस ऑफ़ अर्थ द अवार्ड’ से सम्मानित किया था।

पेयजल का घुटता दम

लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को भारतीय जनता पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया।जिसमे उन्होंने राम मंदिर से लेकर किसानों के हित के लिए भी कई योजनाओं का खाका रखा। वार्तमन समय में किसानों की सबसे बड़ी समस्या पानी बन रही है।

सिंचाई से लेकर पीने के पानी तक के लिए समस्याएं उत्पन्न हो रही है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार अलग से जल शक्ति मंत्रालय बनाएगी, जो मछुआरों के सशक्तीकरण के लिए काम करेगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “आज देश के कई प्रदेशों में पानी की समस्या के समाधान को गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है. इसलिए हम एक अलग ‘जल शक्ति मंत्रालय’ बनाएंगे.”अपने गिनाए वादों में उन्होंने हर घर तक नल से जल पहुंचाने की बात कही.देश में करीब 60 करोड़ लोग

करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा देते हैं. सरकारी दावे चाहे कुछ भी कहें, पर गांवों में जाकर देखी हुई स्थिति तो यही बताती है कि बाकी मौसमों में तो फिर भी ठीक रहता है लेकिन गर्मी के मौसम में उनकी हालत बदतर हो जाती है।

जगह जगह लगाए सरकारी हैंडपंप भी खराब हो चले हैं। जिनकी मरम्मत के लिए आम आदमी को सोचना पड़ता है। जब इंसान के लिए पेयजल का संकट बढ़ रहा है तो निश्चय ही किसानों के पशुओं के लिए तो जल संकट और भी कठिन होगा।

जहां एक ओर गांवों का जल-संकट दूर करने के लिए सरकार पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं करवा रही है। वहीं दूसरी ओर करोड़ों रुपये केन-बेतवा लिंक जैसी बेहद विवादास्पद योजना पर खर्च करने की तैयारी है, जिससे कि जल संकट सहित अनेक पर्यावरणीय समस्याएं और विकट हो सकती हैं।