नींद अपने पते से गायब है और आहट किसी की दरवाजे पर है!

तो रात के 1.30 बजे नज़रे अंधेरे में पूरे कमरे का मुआयना कर रही थी। नींद नहीं आ रही थी, हालांकि ये कोई नई बात नहीं है मगर आज कुछ ज्यादा ही परेशान थे। अब परेशानी क्या थी वह तो मालूम है मगर कुछ ऐसा हुआ था जो अच्छा नहीं लग रहा था।
टारगेट रहा की रात 12:00 बजे तक सारे काम खत्म करके सो जाया करूंगी, मगर शाम में थोड़ा इधर उधर टाइम पास हो गया तो रात में काम करने की रफ्तार बढ़ानी पड़ी। हां लगभग 12:40 तक पूरे कर लिए मैंने। बस बिस्तर पर अपना जिस्म पटका और आंखो को जबरदस्ती बंद कर लिया इस उम्मीद से की सो जाउंगी।
मगर देखो न पिछले 1 घंटे से करवटें बदल रही हूं, और नींद है की चुप मारे जाने कहां पड़ी है। और अकेले कमरे में मुझे अक्सर डर लगता है, कहीं से भी चूहे की आवाज भी एकदम डरा देती है। पता नहीं आस पास किसी के होने कि आहट सी होती है।

अचानक से सिगरेट की गंध सी लगी, कलेजा अब और धक धक करने लगा। खिड़की से आने वाली रौशनी से पता चला रहा था जैसे कोई बाहर टहल रहा हो। जैसे तैसे हिम्मत कर के लाइट ऑन की और खिड़की के धीरे धीरे पास गए। ओह! एक लंबी सांस लेते हुए खिड़की पर ही अपना सर रख दिया।
बगल के दूसरी बिल्डिंग की छत पर मेरे कमरे की खिड़की खुलती है। और वहां आज कोई लड़का किसी से फोन पर बात करते हुए शायद वहीं सिगरेट पी रहा था। वैसे पिछले 2 साल में मैंने कभी भी इस छत पर किसी लड़के को टहलते नहीं देखा था, हो सकता है कोई रिलेटिव हो। तो बस एकटक उस अंधेरे में सिगरेट की जलने कि लौ को निहारते रहे।

और फिर……बस अब भी रात के 2 बज रहे हैं मगर नींद अब भी अपने पते से गायब है।

आहट नींद अजनबी जिंदगी

राफेल पर दोहराई सियासत

जिस पल का पूरा देश इंतजार कर रहा था वो पल आ ही गया। ऐसा लगता है राफेल के साथ साथ कई सियासी दांवपेंच भी एयरबेस पर उतारे गए। साथ ही भारत की वायुसेना को अपराजेय ताकत मिल गई। भारतीय सेना की आन-बान और शान बढ़ाने वाले राफेल के आने से पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन राफेल पर सियासत भी खूब हुई।


कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए उनसे राफेल का दाम पूछा, तो कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अपने ट्वीट में चार सवाल पूछे। राफेल के महंगी कीमत पर, मोदी सरकार का दावा है कि यह डील महंगी नहीं है। इसकी लागत में राफेल में तैनात होने वाली मिसाइलों की कीमत भी शामिल है।

एनडीए सरकार का दावा है कि यूपीए सरकार के दौरान सिर्फ विमान खरीदना तय हुआ था। उस डील के मसौदे में स्पेयर पार्ट्स, हैंगर्स, ट्रेनिंग सिम्युलेटर्स, मिसाइल या हथियार खरीदने का कोई प्रावधान शामिल नहीं था।

भाजपा का दावा है कि 2003 में वाजपेयी सरकार ने राफेल को खरीदने के लिए मंजूरी दी थी। 2004 से 2012 तक यूपीए सरकार ने राफेल को लेकर फ्रांस की दो पार्टियों से बात भी की, फिर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। 2016 में मोदी सरकार ने यह डील फाइनल की।

अब बात ये है कि राफेल सौदे पर इतनी बहस लोगों को उनका ध्यान भटकाने के लिए काफी है या अब राफेल के सच का भी हमेशा हमेशा के लिए राजनीति गलियारे में दम घोंट दिया जाएगा।

दरसअल यहीं होता भी आया है। कुछ ऐसे अनसुलझे मुद्दे आज भी अपने लोकतंत्र में जिंदा है, जिनकी हालत बेजान सी पड़ी है।
http://राफेल
http://राजनीति
http://राफेल घोटाला

लेखन और लेखक

आज के इस दौर में अच्छे लेखकों की पहचान उनके प्रशंसकों की एक लंबी लिस्ट और सोशल मीडिया पर सक्रियता के मापदंडों से की जा रही है। इन सब के चक्कर में हम उन नए लेखकों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। लेखन, जिनका काम नहीं शौक है।

अगर आप भी कभी गौर करेंगे तो आपके अपने ही किसी सोशल अकाउंट पर ऐसे कुछ लोग मिलेंगे जिन के लेख और विचार बेहद उत्कृष्ट कोटि के होंगे। बशर्ते कम फॉलोअर्स के चलते हम उन्हें स्किप कर देते हैं।

एक ऐसे ही शख्स मुकेश जोशी से इसी सोशल प्लेटफॉर्म पर हम भी टकराए थे। इनके विचारों का चुंबकत्व मुझे इन्हें और खंगालने पर मजबूर कर दिया। राजस्थान की धरती से  मुकेश जोशी दिल्ली में रहते हैं। जो तकरीबन 2013-14 से लिख रहे हैं। इन्होंने तीन किताबें भी लिखी है। “किस्सेबाज” और दो काव्य संग्रह “एक बात सुनो” और “लव टेल्स”। 

किताबें लिखने के मामले में यह कहते हैं कि प्रकाशकों के गिध्दपने से मैं तंग हूं, जिन्हें सिर्फ पैसों से मतलब होता है। इसलिए वह किताबों के दाम बढ़ा देते हैं। इन्होने बताया कि फिलहाल दो काव्य संग्रह इनके पास और है मगर ये प्रकाशित नहीं करवाना चाहते हैं। कहते हैं कि किताबें लिखना मेरे लिए धन कमाना नहीं है। उसके लिए मैं कोई और नौकरी करता हूं। चाहता हूं कि जो मैंने अपनी अनुभूतियों को लिखा है लोग बस इसे पढ़े। मेरे शब्द इतने मूल्यवान नहीं है जिसे खरीद कर पढ़ा जाए। 

“राष्ट्र निर्माता कहिए” कुछ ऐसा ही जवाब था इनका जब मैंने पूछा था कि “तो पेशे से अध्यापक हैं आप?”

बता दूं कि केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक हैं यह और अरुणाचल में पोस्टिंग के दौरान इन्होंने जंगली भाषा आदिवासी भाषा भी सीखी है। इसके साथ-साथ बृज भाषा, हिंदी, हरियाणवी और पंजाबी भी जानते हैं।

फिलहाल समाज और जिंदगी पर लिखे गए इनके कोट्स बेहद गहरे और रिलेटबल जान पड़ते हैं। अपने जीवन के 30 बसंत से रूबरू हुए जोशी जी जो बिल्कुल एक नए लेखक हैं।

जिस हिसाब से इनकी लेखनी मंजी हुई है, मुझे यकीन अब भी नहीं होता कि ये बिल्कुल नए लेखक हैं। उभरते हुए नए लेखकों को उनकी प्रतिभा का उत्साहवर्धन करने के लिए उन्होने यू ट्यूब पर एक नया चैनल “किस्सेबाज” बनाया है। जिसमें हर कोई लिखने वाला अपनी रचनाओं आवाज देता है। फिर उसे पोस्ट किया जाता है और पूरी टीम इसका उत्साहवर्धन करती है।


दरअसल सच में अब ऐसा लगता है कि हर कला को रुपए पैसों की नहीं सपोर्ट की जरूरत होती है। जोशी जी के जीवन के रिसर्च के वक़्त मैंने उनसे काफी बातें सीखी और लगा कि एक सच्चा लेखक उनके अंदर पनप चुका है। जिसे हम सबको जानना चाहिए।

जोशी जी के व्यक्तिगत विचार बेहद सुलझे हुए हैं, उन्होने बातो बातों में मुझे बताया कि आसाक्षर और इलिटरेट कितने अलग अलग हैं। उन्होंने बताया कि उनके मां बाप असाक्षर हैं, इलिटरेट नहीं। क्योंकि जिंदगी और संघर्ष का ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा उनके पास है।

जरूरत है अब आंखे खोलने की और ये महसूस करने की कि लेखन जो एक पेशा बन चुका है, वो शौक ही है। जिसे दिल से किया जाना चाहिए। उसमें मसाले डालकर साहित्य को कलंकित न करें। चंद रुपयों खातिर पुस्तक बाजार न बनाया जाय।

@mukesh Joshi official

लेह में पीएम मोदी

“जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल कलम, आज उनकी जय बोल!”

PC – google

कवि रामधारी सिंह दिनकर की लिखी कविता पढ़ते हुए मोदी ने जवानों को संबोधित किया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज सुबह 9.30 बजे अचानक लद्दाख पहुंच गए। गलवान की झड़प के 18 दिन बाद मोदी लद्दाख का दौरा कर रहे हैं। हम आपको बताते हैं उन खास बातों को जो इस संबोधन में ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

1.घाटी की चट्टानों से जवानों की तुलना करते हुए कहा कि आपकी जीवट ता किसी से कम नहीं। आपका ये हौसला, शौर्य और मां भारती के मान-सम्मान की रक्षा के लिए आपका समर्पण अतुलनीय है। आपका निश्चय, उस घाटी से भी सख्त है, जिसको आप रोज अपने कदमों से नापते हैं। आपकी भुजाएं, उन चट्टानों जैसी मजबूत हैं, जो आपके इर्द-गिर्द हैं।

2.आपकी इच्छा शक्ति आस पास के पर्वतों की तरह अटल हैं। दूसरी बात पर गौर करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने विकासवाद का संदेश देते हुए कहा कि आज विश्व विस्तारवाद नहीं, विकासवाद को समर्पित है और विकास की खुली स्पर्धा का स्वागत कर रहा है। राष्ट्र रक्षा से जुड़े किसी लीडर के बारे में सोचता हूं तो मैं सबसे पहले दो माताओं का स्मरण करता हूं। पहली- हम सभी की भारत माता, दूसरी- वे वीर माताएं जिन्होंने आप जैसे योद्धाओं को जन्म दिया है।

Pc- google

3.हर आक्रमण के बाद देश और मजबूत होकर उभरा है। पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण से देश के हर कोने से देश के वीरों ने अपना शौर्य दिखाया। उनके सिंहनाद से धरती अब भी उनका जयकारा कर रही है। आज हर देशवासी का शीश आपके सामने आदरपूर्वक नतमस्तक होकर नमन करता है।

4.सेना के लिए आधुनिक हथियार हो या उनके लिए साजो सामान, हम इस पर बहुत ध्यान देते रहे हैं। बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करीब 3 गुना कर दिया गया है। इससे बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट और सीमा पर सड़कें-पुल बनाने का काम भी बहुत तेजी से हुआ है।

5.और आगे आत्मनिर्भर भारत कि प्रतिज्ञा को पूर्ण करने का विश्वास दिलाते हुए कहा कि जिस भारत के सपने को लेकर आप सरहद पर देश की रक्षा कर रहे हैं, हम आपके सपनों का भारत बनाएंगे। इसमें 130 करोड़ देशवासी पीछे नहीं रहेंगे।

Pc – Google

6.मैं आपको यह विश्वास दिलाने आया हूं। हम आत्मनिर्भर भारत बनाकर ही रहेंगे।

मोदी के लद्दाख पहुंचने के बाद चीन की बौखलाहट सामने आई चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि मिलिट्री और डिप्लोमैटिक बातचीत के जरिए दोनों देश तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में किसी भी पक्ष को ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे हालात बिगड़ें।

जानकारी के मुताबिक, अपने इस दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 कॉर्प्स के अधिकारियों से बात की. इसके अलावा CDS बिपिन रावत के साथ मिलकर मौजूदा स्थिति का जायजा लिया. इस दौरान नॉर्दन आर्मी कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी, लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह भी मौजूद रहे।

लेह pm_modi लेह_में_संबोधन chin

मैं डिप्रेशन हूं, दोषी नहीं!

मिलते जुलते बातें वातें करते रहा करो यार क्या पता कोई सुशांत किसी के जेहन में घर कर रहा हो। मुझे याद है मेरा एक पुराना ब्लॉग https://wp.me/pav0oY-3v जिसे मैंने तब लिखा था जब मुझे भी डिप्रेशन महसूस हो रहा था। पता नहीं  डिप्रेशन उसी को कहते हैं या कुछ और होता है। अब आज ही देख लीजिए कि सोशल मीडिया पर “अगर आप डिप्रेस्ड है तो हमसे बात करिए” जैसे पोस्ट की भरमार लगी पड़ी है।अरे भाई! जो खुद डिप्रेशन में होगा उसे क्या पता होगा हमें किस से बात करनी है? क्या बात करनी है? क्या कहना है?

जितनी गहराई से हम 12वीं में सूक्ष्मदर्शी से नहीं देख पाए, उससे कहीं ज्यादा हम उन विषयों में उद्देश्यविहीन सफ़र कर रहे थे जो अनंत थी। मैं उन विषयों को बेतुका या बेहूदा तो नहीं कहूंगी क्योंकि तब शायद वो महत्वपूर्ण तो थी लेकिन जितना वक्त में उनको दे रही थी उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी।

डिप्रेशन में रहने वाला इंसान दोषी नहीं होता ना खुद का नहीं किसी और का। वह सिर्फ अपने ही विचारों के कालचक्र में फंसा रहता है। उसकी सारी पॉजिटिविटी जो लोगों को नकारात्मक दिखती है वह सिर्फ और सिर्फ उसकी एक्स्ट्रा थिंकिंग होती है। सोचना और ज्यादा सोचना दोनों में फर्क होता है लेकिन फर्क इतना भी नहीं होता कि ज्यादा सोचना गलत हो जाए।

मुझे याद है मेरे कुछ दो चार सगे बंधुओं ने मुझसे कहा था तब कि “शिवानी तुम यह जो सोच रही हो यह बिल्कुल गलत है……..ऐसा नहीं होता” यार जो बंदा पहले से खुद को गलत समझ रहा हो उसे ठीक करने के लिए तुम यह कहो कि तुम गलत हो।
मतलब लोहे को लोहा काटता है यह लॉजिक कहीं और अप्लाई करो भाई यह जिंदगी है इंसान है उसका विचार है।
जहां तक मुझे लगा कि अगर कोई इंसान एक्स्ट्रा थिंकिंग जैसी चीजों से मोहब्बत करने लगा है तो बस उसकी हां में हां मिलाते जाओ। उसके सामने उसके जैसे बनो। कितना लंबा वह सोच रहा है इतना लंबा सोच कर तुम भी उसकी बातों को उसके सामने रखो। तब वह यह महसूस नहीं करेगा कि वह इस वक्त बाकी लोगों से इतर सोच रहा है वह अपने आप को सामान्य महसूस करने लगेगा। असामान्य अवस्था में भी खुद को सामान्य महसूस करना यह बहुत बड़ी बात है और शायद यही दवाई है।

फिर धीरे-धीरे आपसे मिलते जुलते सारी बात बताते उसका दिल हल्का हो जाएगा और तब सचमुच शायद वह डिप्रेशन और एक्स्ट्रा थिंकिंग के चंगुल से बाहर आ जाय।

और मैं बता दूं कि अगर डिप्रेशन की बस से सफर करने निकलोगे तो सिर्फ एक ही जगह जाकर रुकेगी वह भी आत्महत्या तक।

डिप्रेशन और एक्स्ट्रा थिंकिंग तुम्हारी जिंदगी का एक ऐसा जज होता है, जो तुम जैसे बेगुनाह को कटघरे में ला कर तुमसे हीं दलीलें पेश करवाएगा और तुम्हें ही दोषी मानने पर मजबूर भी कर देगा। और इसी में एक खुद्दार इंसान जिसने ना कभी कुछ गलत किया हो और न हीं खुद से गुनाहगार के रूप में मिलने कि उम्मीद किया हो वो फिर कैसे जिएगा??

तो सारा खेल सिर्फ और सिर्फ हमारे विचारों का है। और यह जो हमारे विचार हैं हम से ही जन्म लेते हैं, हमारी संतान हैं। तो हमें इनका सही मार्गदर्शन करना चाहिए। वरना यही विचार हमें महानता की पदवी भी दिलाती है और फांसी के फंदे तक भी ले जाती है।

dipression, sushant, death

guilt

यह विचार और अनुभव स्वतंत्र रूप से मेरे हैं।

कमेंट तक

तो लॉकडाउन का फीवर भी इस जेठ की दुपहरी पर चढ़ा हुआ था। अब माहौल का अंदाजा लगाना भी उतना ही उमस भरा है। ऑनलाइन क्लास के चोंचले, लॉग इन कर के बैठे थे। म्यूट कर के पैर पसार के बिल्कुल अलखरों की तरह ये 30 मिनट काटना था बस। ऊपर से नोटिफिकेशन सरक आया, और इस वक़्त यह बोरिंग साउंड भी लेक्चर से मीठी लग रही थी। इसलिए नजर डाली तो देखा किसी ने हमारी ब्लॉग के लगातार 3 4 कॉमेंट लाईक किए थे और साथ में उनका एक कमेंट भी था।

पता चला ओ तेरी ये स्टोरी https://wp.me/pav0oY-2v
कितनी पुरानी है चलो हम खुद भी एक बार पढ़ लें। उन शब्दों के साथ यादों कि एक बयार चली और स्किन से टकराते हीं मुझे कुछ एहसास करा गई। यार! ये हवाएं अच्छी तो हैं मगर इतनी गर्म क्यों हैं? जो जुबान बोल रही थी वो शरीर का जर्रा ज़र्रा भी महसूस कर रहा था।

आंखे मिचते हुए और एक लम्बी सांस लेते हुए कमेंट सेक्शन में पहुंचे, सोचा देखे तो इन महाशय ने तारीफ के कौन से शब्द भेजे हैं। आखिर एक लेखक चाहता हीं क्या है लोगों की अच्छी प्रतिक्रियाएं। मगर यहां कुछ और भी था जिससे अनजान थे हम।

30-32 कमेंट के बीच दो शब्दों का प्यार कोई और भी छोड़ गया था जो मेरी नजर में आज आया। पहले तो नाम देखकर ही ठिठक गए सोचा डिलीट कर दूं या रहने दूं? साथ ही थोड़ी खुशी थोड़ा खौफ चेहरे से सीने में उतरने लगा।

अब छुप छुप के जिसके बारे में लिखा जाय अगर उस की नजरों में आ जाए और उसका जवाब भी तो कैसा लगता है ये शायद हमने सोचा भी नहीं था।

मगर तसल्ली भी हुई कुछ अच्छा जवाब देख कर और शायद मन के किसी कोने से एक हल्की सी फुसफुसाहट भी हुई की शिवानी क्या हुआ? डर क्यों रही हो? कहानी ही तो है कौन सा कुछ हकीकत लिखा है? अब एक ही कहानी जो सिर्फ दो जन जानते हों फिर वो कहानी होती है या हकीकत मालूम नहीं।


http://कलम_बनारसी
इसे इग्नोर करते हुए हम उन महाशय के कमेंट तक पहुंचे जिनकी वजह से अभी हम खुद से छुपते हुए मुस्कुरा रहे थे।

रिप्लाई कर के हम फिर उन्ही दो शब्दों पर आ कर अटक गए। एक टक देखते देखते फिर से मुस्कुराया और दिल के एक कोने में दबी हुई एक पुरानी मोहबब्त फिर से पनप उठी।तब दिल के कोने से रीसते हुए मोहब्बत की एक मीठी चाशनी फिर से मुझे उन यादों के सीरे में धीरे धीरे लपेटने लगी।

वो पुरानी ब्लॉग https://wp.me/pav0oY-2v


http://यादें
http://इश्क़

उद्योगपतियों की आन, मजदूरी का मान

जिन शहरों ने मजदूरों को धकिया कर निकाल दिया, पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने को मजबूर किया, भूखा रखा, बेघर कर दिया। उन्हें अब अहसास हो रहा है कि मजदूर उनके लिए कितना जरूरी हैं। यहां तक कि कर्नाटक सरकार ने ट्रेन रुकवा दी ताकि बिहार के मजदूर वहां से निकल न जाएं। इन्हें बेहतरी से मालूम है कि दिहाड़ी मजदूरों, अस्थाई मजदूरों का देश में इकनॉमी और इंडस्ट्री को चलने में कितना योगदान है।

PS- google

लॉकडाउन के शुरू होने के बाद से ही परेशान श्रमिकों एवं मजदूरों में पलायन की बढ़ती लालसा को देखकर कंपनी संचालकों में हड़कंप मच गया है। असल में इस डर कि वजह है श्रमशक्ति। क्योंकि श्रमशक्ति की कमी उद्योगों के लिए एक बड़ी संकट बन सकती है। और अगर मजदूर इस लॉक डाउन में सुरक्षित घर पहुंच गए तो इस बात की पूरी गारंटी है कि बिना कोरोना का संकट टले ये वापस नहीं आने वाले। जब तक सरकार ने लॉकडाउन में राहत नहीं दी थी, यानी इंडस्ट्री चालू करने की इजाजत नहीं दी थी, इन मजदूरों की किसी को फिकर नहीं थी।

गाजियाबाद जैसे बड़े औद्योगिक शहरों में कंपनियां खुल गई हैं। और वहां के मजदूर घर न जा पाने कि लाचारी और गरीबी के मारे कोरोना को खुलेआम दावत देने के लिए मजबूर हैं। और ऐसे में अगर वो सुरक्षित घर चले जाएंगे तो इन उद्योगपतियों का क्या होगा?

PS- google

इस विषय का इतना चिंताजनक होना लाजमी है क्योंकि इस वक़्त अपने मुल्क में दो लोग मिलकर देश चला रहे। पहला सरकार और दूसरे उद्योगपति।

यह देखकर अब तक शांत बैठे जिले के औद्योगिक इकाइयों के संचालकों की बेचैनी भी बढ़ गई है। जिले के अलग अलग औद्योगिक एसोसिएशन ने मिलकर एक साझा बयान भी जारी किया है, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मजदूरों को गांव न जाने की सलाह दी गई है।

एसोसिएशन की ओर से कहा गया है कि धीरे धीरे उद्यम शुरू होने लगे हैं। कंस्ट्रक्शन साइट भी चालू होने लगी हैं। इससे लोगों को रोजगार उपलब्ध होने लगा है।

अब सवाल ये है कि इस महामारी में लोगों को उनके रोजगार का हवाला देकर उन्हें बाध्य करने वाली सरकारें उनके स्वास्थ्य का कितना ख्याल रखती हैं। देश की इकनॉमी में मजदूरों की अहमियत का सवाल है और मलाल है कि सब जानते हैं कि मजदूर कितने जरूरी हैं लेकिन कोई उनकी कद्र नहीं करना चाहता।

कटघरे में न्याय

कानून व्यवस्था लचर हो गई है या पुलिस किसी दबाव में है। जी… देश के जिस राज्य में कोरोणा का आतंक सबसे ज्यादा फैला हुआ है लॉक डॉउन में भी वहां 200 से ढाई सौ लोगों का एक साथ दिखना यह भी एक ताज्जुब की बात है। 21वीं सदी में बर्बरता की ऐसी तस्वीर जहां भीड़तंत्र पुलिस तंत्र पर भारी हो जाती है इस वारदात में भीड़ ने जिस तरह निहत्थे वह गेरुआ धारी साधुओं पर निर्मम तरीके से हमला किया वह पूरे देश में शर्मसार करने वाली बात है।

दरअसल यह साधु मुंबई से सूरत अपने गुरु के अंतिम संस्कार में जा रहे थे मगर लॉक डाउन के चलते पुलिस ने ने हाइवे पर जाने से रोक दिया। फिर साधु ग्रामीण इलाके की तरफ मुड़ गए, जहां ये मौब लिंचिंग के शिकार हुए। और यहां पुलिस कि मौजादगी में यह भीडतंत्र दो साधुओं और एक ड्राइवर को निगल जाती है।

महाराष्ट्र के पालघर की यह घटना बेहद शर्मनाक है। साधुओं की सियासत में यह मामला अब भी गर्म है और महाराष्ट्र सरकार कि न्याय व्यवस्था कटघरे में है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् ने भी इस घटना पर गुस्सा जाहिर किया है। और कहा कि अगर जिम्मेदार लोगों पर एक्शन नहीं होता है तो लॉकडाउन के बाद नागा साधुओं की फौज महाराष्ट्र कूच करेगी।

फिलहाल इस मामले में एफआईआर दर्ज कर 110 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 110 में से 101 लोगों को 30 अप्रैल तक पुलिस कस्टडी में भेजा गया है।

महाराष्ट्र_में_भीडतंत्र

कटघरे_में_महाराष्ट्र_सरकार

एक्स्ट्रा नमक

सुनो ये एक्स्ट्रा नमक का प्यार सिर्फ तुम्हारी थाली हीं संभाल सकती है। कहीं ये एक्स्ट्रा प्यार बनकर रिश्तों में आ जाए तो सब कुछ बिखर जाता है। मुझे भी आदत थी बचपन से…… खैर अब भी है, कि खाने के साथ एक्स्ट्रा नमक जरूर चाहिए होता था… सॉरी होता है।

जैसे जैसे बड़े होते गए यहीं एक्स्ट्रा नमक जीभ को छोड़ एक्स्ट्रा प्यार और केयर बन कर मेरी आदत में शुमार होने लगी। मुझे पता न चला कि जो भी मेरी तरफ से होता है वो थोड़ा एक्स्ट्रा हो जाता है जो सबको पसंद नहीं आता। जैसे मेरी तरह एक्स्ट्रा नमक हर किसी के बस की बात नहीं।

16-17 साल की उम्र, एक नया जोश जब हर चीज के करने के लिए दिल में कुछ ज्यादा हीं उमंग होती है। प्यार व्यार भी होता है, साथ जीने मरने वाली ख्याली वादों के साथ। मुझे भी हुआ था इसी जोश के साथ, हालांकि प्यार उसे भी था परवाह भी थी। और यहां मेरी जिंदगी के इस सीन में मेरे एक्स्ट्रा नमक ने एंट्री मारी।

और मेरी तरफ से मेरा एक्स्ट्रा प्यार और परवाह उसके गले की फांसी बनने लगी। लाज़मी है भाई क्योंकि इस उम्र में हमें आजादी चाहिए होती है और ये एक्स्ट्रा वेक्सट्रा टाइप वाली चीजें बिल्कुल वाहियात सी लगती हैं। तो इस वजह से यहां लव सीन का दी एंड हो गया। अब भी इस एक्स्ट्रा नमक ने दम न छोड़ा, अभी एकाध उदाहरण से और मुखातिब होने वाले थे हम।

तो अब ब्रेकअप 💔💔 था…. औरों कि तरह हमें भी लगने लगा था कि मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता, और भी बहुत कुछ। तो इन कंधो ने अपने ऊपर किसी का हाथ महसूस किया। बेशक जिसे हम एक अच्छा दोस्त कहते हैं। जो होता ही तुम्हें तुम्हारे बुरे वक़्त में तुम्हे संभालने के लिए।

बस ठीक चलने लगा था सब, ये अच्छा दोस्त अब जिगर का टुकड़ा हो गया। होगा भी क्यों नहीं क्योंकि दिल को लगने लगता है कि अरे इसके अलावा कोई समझ ही नहीं सकता। 😂😂😂

वजह थी कि यहां भी एक्स्ट्रा नमक का पदार्पण तब तक हो चुका था। मेरी एक्स्ट्रा केयर और प्यार यहां भी ख़ाक कर गई सब। 🤷🤷

फिर से रह गए हम अकेले अपने इस एक्स्ट्रा नमक वाली आदत से मोहब्बत करते हुए। 😬😬 और हर लज़ीज़ व्यंजन का मजा बिगाड़ कर अपनी जिह्वा को एक असीम सुख देते हुए।

इतना काफी होगा शायद एक्स्ट्रा नमक का थाली से और एक्स्ट्रा प्यार और केयर का रिश्तों से संबंध का एक छोटे से उदाहरण से आपके दिमाग पर थोड़ा जोर देने के लिए। कहीं आपके भी कुछ रिश्ते इसी एक्स्ट्रा ……………………. ????

सोचिए जरा और अगर आपके भी ऐसा कोई उदाहरण हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

एक्स्ट्रा नमक

फटी बिवाईयों तले बिफर पड़ी मजबूरी!

जब एक 8 साल के बच्चे का 200 किमो पैदल चलकर भी उसकी आंखो में गांव जाने की भूख उसके पैरों के थकान पर हावी रहती है तो लगता है इसे हौसला कहुं या बेबसी। सरकार कहती है की लॉक डाउन का मतलब होता है की जहां है वहीं बने रहें, मगर इन मजदूरों के लिए ये कैसे संभव होता।

जब भूख इनकी इनके सामने मौत का मंजर दिखाने लगी तो अपने घर परिवार से मिलने की तमन्ना ने इन्हे पैदल चलने पर मजबूर कर दिया। करें भी तो क्या क्योंकि लॉक डाउन का सबसे बुरा असर प्रवासी खासकर दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा है। इनका रोजगार छिन गया है। निजी और सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदी के कारण इन्हें पैदल ही लौटना पड़ रहा है।

सोचो जरा जेब में खनक जब हौसलों की हो और आंखो में भूख घर पहुंचने की तब रास्ते भी खुद को खुद में समेटने पर मजबूर हो जाएंगे। 

बात इस स्थिति में इनके रोजगार और आजीविका की करे तो मनरेगा के काम पहले से ही बंद हैं, अब शहर में निर्माण गतिविधियों पर रोक लग जाने से रोजी-रोटी के लाले पड़ गए हैं।  प्रशासन की सहायता अभी शहरी क्षेत्र तक सीमित है, ग्रामीण इलाकों के अंतिम छोर तक नहीं पहुंची है।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा घोषित मनरेगा के पैकेज के तहत यदि राशि हर मजदूर के खाते में पहुंच जाए तो संकट काल में यही एक राहत हो सकती है। जिले की 22 लाख की आबादी में मनरेगा के रजिस्टर्ड मजदूर 3.53 लाख हैं। गैर सरकारी एक लाख शहरी मजदूरों को और जोड़ लिया जाए तो यह संख्या करीब 4.50 लाख पहुंच जाती है।

इस लॉकडाउन में सरकार ने मजदूरों के खाते में 1000 रुपए दिए जाने को घोषणा की है। मगर उनका क्या जिनका कोई घर हीं नहीं है उनके बैंक अकाउंट की उम्मीद हम कैसे कर लें? दिल्ली और अन्य बड़े शहरों के फुटपाथों पर सोने वाले उन हजारों लोगों का क्या जिनकी जिंदगी हर सुबह एक नए पहिए से खुद को घसीटती है।

https://youtu.be/574wnOIXGdY

On YouTube 👇👇

https://youtu.be/574wnOIXGdY

Create your website at WordPress.com
Get started