एक, दो, तीन पटेल नियम लागू

पटेल को लेकर मेरी एक कहावत है, जहां न पहुंचे तेल वहां पहुंचे पटेल। ऐसा क्यों वो आगे भौकेंगे हम। क्योंकि पटेल के लिए हम पांचों पालतू कुत्ते की तरह है जिन्हें उसे तीन साल पालना था। ऐसा वो हमेशा भौंकती थी। और उसके मुताबिक हम लोग उसे कुछ बता रहे हैं तो मतलब हम […]

एक, दो, तीन पटेल नियम लागू

तुम आना कभी…..

कविता…… अब नहीं लिख पाते। नहीं ढूंढ पाते अब अपने जज्बातों के अल्फाज। नहीं समेट पाते अच्छी यादें, नहीं पिरो पाते हैं अब दुख के मोतियों को हालात के धागे में।
वो संजीदगी वो ठहराव जिंदगी से कहीं गुम सी गई है। अपने आप में से बहुत कुछ खोया खोया सा लगता है। सच कहूं तो रूह के इस जर्जर मकान में कुछ नहीं बचा।

तुम आना कभी यहां तो देखना बची होंगी तो दो चार किताबें जिन्हें कई दफा पढ़ा होगा। दो चार फिल्में जिन्हे कई दफा जिया होगा। और हां दो चार शख्स जिनकी सलामती की दुआ। इसके अलावा भी अगर जोर डालूं तो याद आता है कि कहीं कोने में मोहब्बत का मट मैला टुकड़ा जिसे अबतक संभाल के रखा है। वो महज एक टुकड़ा क्यों है और उसमें से इतनी बू क्यों आ रही ये शायद ही समझा पाऊं। मगर अभी तक पास रखा है और उसे खोने से क्यों डरते हैं इसका सही जवाब भी नहीं मिल पाया। सोचा था कि शायद आगे इसका जवाब उम्र देगी।

कहीं किसी बंद रोशनदान के ऊपर देखना, मिलेंगे थोड़े अनसुलझे ख्याल। जो शायद वक्त पर किवाड़ खुले रहते तो सुलझ गए होते। मगर देखो न उम्मीद में वो ख्याल आज भी वहीं पड़े होंगे, उस रोशनदान के किवाड़ के खुलने के इंतजार मे। और भूल के भी खिड़कियां खोलने की कोशिश मत करना। उसे जैसे तैसे बंद कर रखा है। बाहर से आती तेज रोशनी और हवाओं से अब डर लगता है। घबरा जाती हूं लोगों के मोटिवेशनल बातों से, भविष्य की चिंता और बेसबब अतीत और वर्तमान  के जहन में कौंधे डर से। मगर हां देखना तुम उस खिड़की में बने एक छोटे से सुराख से, जिससे मैं पूरी दुनिया देखती हूं। उनकी सच्चाई, उन्हें जीते, लड़ते और मरते हुए। जिंदगी को सुकून से जीने की जद्दोजहद में समाज द्वारा बने तथाकथित सीमाओं को  लांघते हुए। मैं हर रोज देखती हूं उन रिश्तों का बलात्कार होते हुए जिनकी पवित्रता का उल्लेख शास्त्रों में भर भर के है। उस सुराख से मैं जितनी दुनिया देख पाई हूं, मुझे उसकी सच्चाई से घृणा होने लगी है। इसलिए अब और देखने की इच्छा नहीं है। हम क्यों अपने आप को असीमित रखना चाहते हैं। दुनिया का विस्तारवाद……. उफ्फ किसी बंद कमरे सी हैं ये सब बातें।


और हां छत के ज्यादा किनारे जा कर मत झांकना…..मुंडेर नहीं है। सीमाएं देखने की आदत मुझे आज भी नहीं हो पाई, शायद इसलिए नहीं बनाया। मेरी कोई भी शुरुआत का अंत नहीं सोचा, इसका अर्थ  ये नही की वो उद्देश्यविहीन हैं। ढूंढोगे अगर पूरी शिद्दत से तो बाहरी आंगन में पौधों के पास  मुरझाए फूलों में मिलेंगे कुछ एकाध खत। जिनमें से आती उन अनकही बातों की खुशबू………….जो कभी कभी मेरे दिल को मोहब्बत के एहसास से दुलारती है।

हर कमरे के पर्दों से लिपटे गर्द में मिलेंगे मेरे अथाह सवाल जो इसका जवाब बताने वाले से पूछ पाने की हिम्मत ही नहीं हुई। समाज ने रिश्तों के लिहाज से जुबां को ऐसे जकड़ रखा है की वो सवाल मेरे सवाल बनकर ही रह जायेंगे। उठाना मेरे सिरहाने की बेडशीट…….. दिखेंगे वहां कुछ ख्वाहिशों की रौंदी हुई पुरतें। जिनमें हकीकत होने की उम्मीद जरा बाकी होगी। वक्त और हालत तब उसकी गवाही देने को मौजूद तो नहीं होंगे। मगर हां तुम्हे यकीन करना होगा। और जाते जाते किवाड़ बंद मत करना……मुझे इंतजार है मेरा!

और हां अगर कुछ भूल रही हूं तो…. जब आओगे तुम में से कोई भी मेरे इस खंडहर मकान में तो ढूंढना अच्छे से मुझे। दिखेगा तो कुछ नहीं मगर जहां भी हाथ रखोगे यादों और बातों की एक लंबी कहानी लेकर जाओगे।

छूट गई सिमरन…

आज मैं अपने आप के एक नए रूप से मिलने वाली थी। मतलब ये कि मेरे अंदर एक ऐसी शिवानी भी रहती है, इससे अभी तक अनभिज्ञ थे हम।
शाम के चार बज रहे थे और कमरे से अलविदा लेती धूप को एकटक निहार रहे थे। बहुत कुछ खास तो नहीं मगर कुछ अच्छा सोच रहे थे। अचानक से रिंग बजी और हमेशा कि तरह ‘ हैलो’
ना ही ये कोई अजनबी था और ना ही नंबर अनजान। बल्कि ये वही शख्स था जिससे दिन के हर पहर बात करना फिक्स था। आवाज आई ‘ तुम्हें भी आना चाहिए था  यार!’

इतना सुन के मन मसोसते हुए बोला ‘चाचा जी थे तुम्हारे यार, वैसे क्या ही करते आ के…….’ अपने आप को एक झूठी सांत्वना देते हुए मैंने एक लम्बी सांस ली और छत पर उन ठंडी हवाओं को महसूस कर कुछ भूलने की कोशिश करने लगे।
तब तक उसकी वहीं हंसी में अठखेलियां करती बातें शुरू हो गई…..हालांकि मेरा ध्यान उसकी एक भी बात पर नहीं था। और उसे ये महसूस होना जायज था कि मैं उसकी तरफ ध्यान नहीं दे रही हूं।

उसने मुझसे पूछा कि क्या हुआ कहीं बिजी हो? मेरे मन में भी कोई और ही खिचड़ी पक रही थी। मैंने कहा, कुछ काम कर रही हूं मैं 2 मिनट बाद फोन करती हूं तुम्हें। उसने कहा ठीक है, मैंने उससे पूछा तुम्हारी ट्रेन कितने बजे की है। उसने कहा 4:50 की है और सच बताऊं तो इस वक्त घड़ी में 4:16 हो रहे थे।

बस फिर क्या था किस्मत से एक और बाजी लगाने को तैयार थे हम। जैसे तैसे पूरे 8 मिनट में जरूरी सामान लेकर कमरे को लॉक करके नीचे आए और दौड़ते दौड़ते ऑटो के लिए चौराहे तक पहुंचते-पहुंचते 4: 32 हो चुके थे। दिल बैठा जा रहा था कि सामान्यतः मैं स्टेशन पर 45 मिनट में पहुंचती थी आज मैं इतनी जल्दी उससे कैसे मिल पाऊंगी। मगर पता नहीं क्यों दिल में उम्मीद थी कि, नहीं हो जाएगा।

बस फिर वहां तक पहुंचने के लिए वक्त को बांधने के सारे इंतजाम किए मैंने। सभी भगवान याद आ गए, सामान्यतः मेरा इन लोगों से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। मगर दिल में यही था बस की मेरी किस्मत इतनी बुरी नहीं है, मिल लूंगी। आज अपने उसूलों से भी सौदा करने को तैयार थे हम। अपने कुछ उसूलों को लेकर बड़े स्ट्रिक्ट थे हम, कि यह काम नहीं करना है मतलब कुछ भी हो जाए नहीं करना है। वैसे ये वाले उसूल और कायदे मुझे घर से मिले संस्कारों के साथ जबरदस्ती थोपे नहीं गए थे।

इस बार मैं थोड़ा एहतियात बरतते हुए उस अनजान आदमी के कंधे पर बिना हाथ रखे आराम से बैठ गई। दरअसल इस टाइम फास्ट जर्नी को लेकर ओला, उबर काफी ट्रेंड में था। मैंने भी ऑटो ढूंढने, इतंजार करने से ज्यादा बेहतर ओला बाइक ही समझा और बैठ गए। अपने उसूलों को धोखे में रख उस आदमी से बहुत दूरी बनाकर बैठ गए। खुद को बार बार ये दिलासा दिलाते हुए की अरे सब ठीक है, इतना भी गलत नहीं है।

अब आलम यह था कि ना तो सांस लेते बनती थी ना तो छोड़ते बनती थी। क्योंकि मैंने खुद कहा था कि मुझे बहुत जल्दी पहुंचना है।  इसलिए अब हम किसी ऐसे अनजान रास्ते से जा रहे थे जहां ट्रकों की शोर के पीछे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। शहर के बाहर का पहाड़ी रास्ता जो छोटी-छोटी पहाड़ियों से होकर जाती थी। अब उससे यह पूछना भी बेवकूफी होती कि हम किस रास्ते से जा रहे हैं। शाम का यह अंधियारा और यह अजनबी के साथ यह अनजान सफर अंदर ही अंदर मेरा गला घोंटने लगा।

सभी पशु पक्षी अपने घर की तरफ रवाना हो रहे थे। और एक हम थे जो सांसे अटकी हुई थी कि अगले पल क्या होने वाला है। अंदर से थोड़ा धैर्य उधार मांगा और सोचा कहीं और ले कर जाएगा तो कूद जाऊंगी। बस अब स्टेशन पहुंचने की मन्नत गई भाड़ में, खुद को सुरक्षित होने की कामना करने लगे। ट्रकों की तेज रफ्तार हवाओं को और भयानक बना रही थीं। मैंने जोर से बाइक के पीछे की हैंडल पकड़ी और आंखे बन्द कर ली।

उसके 2 मिनट बाद गाड़ियों के चिल्ल प्पौं की आवाज से आंखे अचानक से खुल गई और लगा जैसे किसी नए शहर में आ गए हों। कितना नया था यह सब कुछ, कौन सी जगह है ये? मैं ये पूछने ही वाली थी तब तक चाय के उसी भट्टठी पर निगाहें जा कर रुकीं जहां अक्सर आते और जाते मैं रुका जाया करती थी। अभी कुछ ही पल मैं खौफ के जिस अंधरे में थी मुझे इसका तनिक आभास नहीं रहा। क्योंकि अब मैं स्टेशन के गेट के सामने थी। शक्ल पर एक इतनी बड़ी मुस्कान जिसे और खिलने के लिए मेरे होठों का दायरा कम पड़ गया।

मैंने उनके पैसे दिए और थैंक्यू बोल कर तेजी से दौड़ पड़ी। घड़ी में देखा तो दिल ही बैठ गया। 4:58 हो चुके थे, गाड़ी 4:50 की ही थी। फिर लगा यहां तक आ कर तो वापस नहीं लौटूंगी। मैंने उसे फोन किया कि, ‘ गाड़ी चल पड़ी?…..’
आवाज आई, ‘ हां मगर, तुम कहां हो…..एक मिनट कहीं तुम यहीं तो नहीं हो……रुको मैं खुद रुक उतर जाता हूं, आ रहा हूं……’ उस लड़के की हड़बड़ाहट और चिंता के आगे उसकी खुशी शायद वो खुद महसूस ही नहीं कर पाया।

उसके बाद उसने क्या क्या बोला मुझे होश ही नहीं रहा। ऊपर की तरफ से जाने का रास्ता बन्द हो चुका था। बेसमेंट से जाना था, जो कि लगभग 20 डिग्री एंगल के ढलान पर रही होगी। भागते भागते सामने वाली दीवाल से इतनी जोर से टकराए कि हाथों से प्रतिरोध भी कमजोर पड़ गया। तनिक भी इसका आभास नहीं रहा था कि लोग मुझे घूर रहे हैं। मैंने उससे पूछा कि कौन से प्लेटफॉर्म पर से गाड़ी जा रही है। उसने कहा 5 पर है आओ जल्दी थोड़े टाइम के लिए रूकी है। थोड़ा और हौसला बढ़ा……रफ्तार तेज कर दी,
ओह! फाइनली, मंजिल मिल गई……. मैं प्लेटफॉर्म नंबर 5 पर और गाड़ी भी बहुत स्लो चल रही है। उसने कहा मैं बाहर हूं देख तो सही……

आंखो मे शायद इतनी खुशी थी कि कुछ धुंधला सा पड़ गया। मैं जिसे प्लेटफॉर्म 5 समझकर धीरे चलती ट्रेन देखकर इतनी खुश हो गई थी। वो दरअसल 3 थी……….. शिट्ट, मैं 3 पे हूं यार……..

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गाड़ी भी जा चुकी थी बहुत दूर, मगर वो शख्स
हां वहीं………आज इतने सालों बाद भी दिल के उसी कोने में महफूज है। कौन है? क्या लगता है? ये शायद हीं मैं बता पाऊं।

मुझे जरा भी अफसोस नहीं हुआ की मैं उससे मिल नहीं पाई। बल्कि अपने आप में इतनी ऊर्जा देखकर दंग थी मैं। हालांकि उससे मिलने का कोई वाजिब कारण भी नहीं था। बस मैं क्यों चली आई, मुझे खुद नहीं मालूम। आते वक्त हंसते हुए यू हीं निकल गया कि, ‘ छूट गई सिमरन….’

नींद अपने पते से गायब है और आहट किसी की दरवाजे पर है!

तो रात के 1.30 बजे नज़रे अंधेरे में पूरे कमरे का मुआयना कर रही थी। नींद नहीं आ रही थी, हालांकि ये कोई नई बात नहीं है मगर आज कुछ ज्यादा ही परेशान थे। अब परेशानी क्या थी वह तो मालूम है मगर कुछ ऐसा हुआ था जो अच्छा नहीं लग रहा था।
टारगेट रहा की रात 12:00 बजे तक सारे काम खत्म करके सो जाया करूंगी, मगर शाम में थोड़ा इधर उधर टाइम पास हो गया तो रात में काम करने की रफ्तार बढ़ानी पड़ी। हां लगभग 12:40 तक पूरे कर लिए मैंने। बस बिस्तर पर अपना जिस्म पटका और आंखो को जबरदस्ती बंद कर लिया इस उम्मीद से की सो जाउंगी।
मगर देखो न पिछले 1 घंटे से करवटें बदल रही हूं, और नींद है की चुप मारे जाने कहां पड़ी है। और अकेले कमरे में मुझे अक्सर डर लगता है, कहीं से भी चूहे की आवाज भी एकदम डरा देती है। पता नहीं आस पास किसी के होने कि आहट सी होती है।

अचानक से सिगरेट की गंध सी लगी, कलेजा अब और धक धक करने लगा। खिड़की से आने वाली रौशनी से पता चला रहा था जैसे कोई बाहर टहल रहा हो। जैसे तैसे हिम्मत कर के लाइट ऑन की और खिड़की के धीरे धीरे पास गए। ओह! एक लंबी सांस लेते हुए खिड़की पर ही अपना सर रख दिया।
बगल के दूसरी बिल्डिंग की छत पर मेरे कमरे की खिड़की खुलती है। और वहां आज कोई लड़का किसी से फोन पर बात करते हुए शायद वहीं सिगरेट पी रहा था। वैसे पिछले 2 साल में मैंने कभी भी इस छत पर किसी लड़के को टहलते नहीं देखा था, हो सकता है कोई रिलेटिव हो। तो बस एकटक उस अंधेरे में सिगरेट की जलने कि लौ को निहारते रहे।

और फिर……बस अब भी रात के 2 बज रहे हैं मगर नींद अब भी अपने पते से गायब है।

आहट नींद अजनबी जिंदगी

राफेल पर दोहराई सियासत

जिस पल का पूरा देश इंतजार कर रहा था वो पल आ ही गया। ऐसा लगता है राफेल के साथ साथ कई सियासी दांवपेंच भी एयरबेस पर उतारे गए। साथ ही भारत की वायुसेना को अपराजेय ताकत मिल गई। भारतीय सेना की आन-बान और शान बढ़ाने वाले राफेल के आने से पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन राफेल पर सियासत भी खूब हुई।


कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए उनसे राफेल का दाम पूछा, तो कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने अपने ट्वीट में चार सवाल पूछे। राफेल के महंगी कीमत पर, मोदी सरकार का दावा है कि यह डील महंगी नहीं है। इसकी लागत में राफेल में तैनात होने वाली मिसाइलों की कीमत भी शामिल है।

एनडीए सरकार का दावा है कि यूपीए सरकार के दौरान सिर्फ विमान खरीदना तय हुआ था। उस डील के मसौदे में स्पेयर पार्ट्स, हैंगर्स, ट्रेनिंग सिम्युलेटर्स, मिसाइल या हथियार खरीदने का कोई प्रावधान शामिल नहीं था।

भाजपा का दावा है कि 2003 में वाजपेयी सरकार ने राफेल को खरीदने के लिए मंजूरी दी थी। 2004 से 2012 तक यूपीए सरकार ने राफेल को लेकर फ्रांस की दो पार्टियों से बात भी की, फिर इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। 2016 में मोदी सरकार ने यह डील फाइनल की।

अब बात ये है कि राफेल सौदे पर इतनी बहस लोगों को उनका ध्यान भटकाने के लिए काफी है या अब राफेल के सच का भी हमेशा हमेशा के लिए राजनीति गलियारे में दम घोंट दिया जाएगा।

दरसअल यहीं होता भी आया है। कुछ ऐसे अनसुलझे मुद्दे आज भी अपने लोकतंत्र में जिंदा है, जिनकी हालत बेजान सी पड़ी है।
http://राफेल
http://राजनीति
http://राफेल घोटाला

लेखन और लेखक

आज के इस दौर में अच्छे लेखकों की पहचान उनके प्रशंसकों की एक लंबी लिस्ट और सोशल मीडिया पर सक्रियता के मापदंडों से की जा रही है। इन सब के चक्कर में हम उन नए लेखकों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। लेखन, जिनका काम नहीं शौक है।

अगर आप भी कभी गौर करेंगे तो आपके अपने ही किसी सोशल अकाउंट पर ऐसे कुछ लोग मिलेंगे जिन के लेख और विचार बेहद उत्कृष्ट कोटि के होंगे। बशर्ते कम फॉलोअर्स के चलते हम उन्हें स्किप कर देते हैं।

एक ऐसे ही शख्स मुकेश जोशी से इसी सोशल प्लेटफॉर्म पर हम भी टकराए थे। इनके विचारों का चुंबकत्व मुझे इन्हें और खंगालने पर मजबूर कर दिया। राजस्थान की धरती से  मुकेश जोशी दिल्ली में रहते हैं। जो तकरीबन 2013-14 से लिख रहे हैं। इन्होंने तीन किताबें भी लिखी है। “किस्सेबाज” और दो काव्य संग्रह “एक बात सुनो” और “लव टेल्स”। 

किताबें लिखने के मामले में यह कहते हैं कि प्रकाशकों के गिध्दपने से मैं तंग हूं, जिन्हें सिर्फ पैसों से मतलब होता है। इसलिए वह किताबों के दाम बढ़ा देते हैं। इन्होने बताया कि फिलहाल दो काव्य संग्रह इनके पास और है मगर ये प्रकाशित नहीं करवाना चाहते हैं। कहते हैं कि किताबें लिखना मेरे लिए धन कमाना नहीं है। उसके लिए मैं कोई और नौकरी करता हूं। चाहता हूं कि जो मैंने अपनी अनुभूतियों को लिखा है लोग बस इसे पढ़े। मेरे शब्द इतने मूल्यवान नहीं है जिसे खरीद कर पढ़ा जाए। 

“राष्ट्र निर्माता कहिए” कुछ ऐसा ही जवाब था इनका जब मैंने पूछा था कि “तो पेशे से अध्यापक हैं आप?”

बता दूं कि केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक हैं यह और अरुणाचल में पोस्टिंग के दौरान इन्होंने जंगली भाषा आदिवासी भाषा भी सीखी है। इसके साथ-साथ बृज भाषा, हिंदी, हरियाणवी और पंजाबी भी जानते हैं।

फिलहाल समाज और जिंदगी पर लिखे गए इनके कोट्स बेहद गहरे और रिलेटबल जान पड़ते हैं। अपने जीवन के 30 बसंत से रूबरू हुए जोशी जी जो बिल्कुल एक नए लेखक हैं।

जिस हिसाब से इनकी लेखनी मंजी हुई है, मुझे यकीन अब भी नहीं होता कि ये बिल्कुल नए लेखक हैं। उभरते हुए नए लेखकों को उनकी प्रतिभा का उत्साहवर्धन करने के लिए उन्होने यू ट्यूब पर एक नया चैनल “किस्सेबाज” बनाया है। जिसमें हर कोई लिखने वाला अपनी रचनाओं आवाज देता है। फिर उसे पोस्ट किया जाता है और पूरी टीम इसका उत्साहवर्धन करती है।


दरअसल सच में अब ऐसा लगता है कि हर कला को रुपए पैसों की नहीं सपोर्ट की जरूरत होती है। जोशी जी के जीवन के रिसर्च के वक़्त मैंने उनसे काफी बातें सीखी और लगा कि एक सच्चा लेखक उनके अंदर पनप चुका है। जिसे हम सबको जानना चाहिए।

जोशी जी के व्यक्तिगत विचार बेहद सुलझे हुए हैं, उन्होने बातो बातों में मुझे बताया कि आसाक्षर और इलिटरेट कितने अलग अलग हैं। उन्होंने बताया कि उनके मां बाप असाक्षर हैं, इलिटरेट नहीं। क्योंकि जिंदगी और संघर्ष का ज्ञान हमसे कहीं ज्यादा उनके पास है।

जरूरत है अब आंखे खोलने की और ये महसूस करने की कि लेखन जो एक पेशा बन चुका है, वो शौक ही है। जिसे दिल से किया जाना चाहिए। उसमें मसाले डालकर साहित्य को कलंकित न करें। चंद रुपयों खातिर पुस्तक बाजार न बनाया जाय।

@mukesh Joshi official

लेह में पीएम मोदी

“जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल कलम, आज उनकी जय बोल!”

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कवि रामधारी सिंह दिनकर की लिखी कविता पढ़ते हुए मोदी ने जवानों को संबोधित किया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज सुबह 9.30 बजे अचानक लद्दाख पहुंच गए। गलवान की झड़प के 18 दिन बाद मोदी लद्दाख का दौरा कर रहे हैं। हम आपको बताते हैं उन खास बातों को जो इस संबोधन में ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

1.घाटी की चट्टानों से जवानों की तुलना करते हुए कहा कि आपकी जीवट ता किसी से कम नहीं। आपका ये हौसला, शौर्य और मां भारती के मान-सम्मान की रक्षा के लिए आपका समर्पण अतुलनीय है। आपका निश्चय, उस घाटी से भी सख्त है, जिसको आप रोज अपने कदमों से नापते हैं। आपकी भुजाएं, उन चट्टानों जैसी मजबूत हैं, जो आपके इर्द-गिर्द हैं।

2.आपकी इच्छा शक्ति आस पास के पर्वतों की तरह अटल हैं। दूसरी बात पर गौर करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने विकासवाद का संदेश देते हुए कहा कि आज विश्व विस्तारवाद नहीं, विकासवाद को समर्पित है और विकास की खुली स्पर्धा का स्वागत कर रहा है। राष्ट्र रक्षा से जुड़े किसी लीडर के बारे में सोचता हूं तो मैं सबसे पहले दो माताओं का स्मरण करता हूं। पहली- हम सभी की भारत माता, दूसरी- वे वीर माताएं जिन्होंने आप जैसे योद्धाओं को जन्म दिया है।

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3.हर आक्रमण के बाद देश और मजबूत होकर उभरा है। पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण से देश के हर कोने से देश के वीरों ने अपना शौर्य दिखाया। उनके सिंहनाद से धरती अब भी उनका जयकारा कर रही है। आज हर देशवासी का शीश आपके सामने आदरपूर्वक नतमस्तक होकर नमन करता है।

4.सेना के लिए आधुनिक हथियार हो या उनके लिए साजो सामान, हम इस पर बहुत ध्यान देते रहे हैं। बॉर्डर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करीब 3 गुना कर दिया गया है। इससे बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट और सीमा पर सड़कें-पुल बनाने का काम भी बहुत तेजी से हुआ है।

5.और आगे आत्मनिर्भर भारत कि प्रतिज्ञा को पूर्ण करने का विश्वास दिलाते हुए कहा कि जिस भारत के सपने को लेकर आप सरहद पर देश की रक्षा कर रहे हैं, हम आपके सपनों का भारत बनाएंगे। इसमें 130 करोड़ देशवासी पीछे नहीं रहेंगे।

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6.मैं आपको यह विश्वास दिलाने आया हूं। हम आत्मनिर्भर भारत बनाकर ही रहेंगे।

मोदी के लद्दाख पहुंचने के बाद चीन की बौखलाहट सामने आई चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि मिलिट्री और डिप्लोमैटिक बातचीत के जरिए दोनों देश तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में किसी भी पक्ष को ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे हालात बिगड़ें।

जानकारी के मुताबिक, अपने इस दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 कॉर्प्स के अधिकारियों से बात की. इसके अलावा CDS बिपिन रावत के साथ मिलकर मौजूदा स्थिति का जायजा लिया. इस दौरान नॉर्दन आर्मी कमांड के लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी, लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह भी मौजूद रहे।

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मैं डिप्रेशन हूं, दोषी नहीं!

मिलते जुलते बातें वातें करते रहा करो यार क्या पता कोई सुशांत किसी के जेहन में घर कर रहा हो। मुझे याद है मेरा एक पुराना ब्लॉग https://wp.me/pav0oY-3v जिसे मैंने तब लिखा था जब मुझे भी डिप्रेशन महसूस हो रहा था। पता नहीं  डिप्रेशन उसी को कहते हैं या कुछ और होता है। अब आज ही देख लीजिए कि सोशल मीडिया पर “अगर आप डिप्रेस्ड है तो हमसे बात करिए” जैसे पोस्ट की भरमार लगी पड़ी है।अरे भाई! जो खुद डिप्रेशन में होगा उसे क्या पता होगा हमें किस से बात करनी है? क्या बात करनी है? क्या कहना है?

जितनी गहराई से हम 12वीं में सूक्ष्मदर्शी से नहीं देख पाए, उससे कहीं ज्यादा हम उन विषयों में उद्देश्यविहीन सफ़र कर रहे थे जो अनंत थी। मैं उन विषयों को बेतुका या बेहूदा तो नहीं कहूंगी क्योंकि तब शायद वो महत्वपूर्ण तो थी लेकिन जितना वक्त में उनको दे रही थी उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी।

डिप्रेशन में रहने वाला इंसान दोषी नहीं होता ना खुद का नहीं किसी और का। वह सिर्फ अपने ही विचारों के कालचक्र में फंसा रहता है। उसकी सारी पॉजिटिविटी जो लोगों को नकारात्मक दिखती है वह सिर्फ और सिर्फ उसकी एक्स्ट्रा थिंकिंग होती है। सोचना और ज्यादा सोचना दोनों में फर्क होता है लेकिन फर्क इतना भी नहीं होता कि ज्यादा सोचना गलत हो जाए।

मुझे याद है मेरे कुछ दो चार सगे बंधुओं ने मुझसे कहा था तब कि “शिवानी तुम यह जो सोच रही हो यह बिल्कुल गलत है……..ऐसा नहीं होता” यार जो बंदा पहले से खुद को गलत समझ रहा हो उसे ठीक करने के लिए तुम यह कहो कि तुम गलत हो।
मतलब लोहे को लोहा काटता है यह लॉजिक कहीं और अप्लाई करो भाई यह जिंदगी है इंसान है उसका विचार है।
जहां तक मुझे लगा कि अगर कोई इंसान एक्स्ट्रा थिंकिंग जैसी चीजों से मोहब्बत करने लगा है तो बस उसकी हां में हां मिलाते जाओ। उसके सामने उसके जैसे बनो। कितना लंबा वह सोच रहा है इतना लंबा सोच कर तुम भी उसकी बातों को उसके सामने रखो। तब वह यह महसूस नहीं करेगा कि वह इस वक्त बाकी लोगों से इतर सोच रहा है वह अपने आप को सामान्य महसूस करने लगेगा। असामान्य अवस्था में भी खुद को सामान्य महसूस करना यह बहुत बड़ी बात है और शायद यही दवाई है।

फिर धीरे-धीरे आपसे मिलते जुलते सारी बात बताते उसका दिल हल्का हो जाएगा और तब सचमुच शायद वह डिप्रेशन और एक्स्ट्रा थिंकिंग के चंगुल से बाहर आ जाय।

और मैं बता दूं कि अगर डिप्रेशन की बस से सफर करने निकलोगे तो सिर्फ एक ही जगह जाकर रुकेगी वह भी आत्महत्या तक।

डिप्रेशन और एक्स्ट्रा थिंकिंग तुम्हारी जिंदगी का एक ऐसा जज होता है, जो तुम जैसे बेगुनाह को कटघरे में ला कर तुमसे हीं दलीलें पेश करवाएगा और तुम्हें ही दोषी मानने पर मजबूर भी कर देगा। और इसी में एक खुद्दार इंसान जिसने ना कभी कुछ गलत किया हो और न हीं खुद से गुनाहगार के रूप में मिलने कि उम्मीद किया हो वो फिर कैसे जिएगा??

तो सारा खेल सिर्फ और सिर्फ हमारे विचारों का है। और यह जो हमारे विचार हैं हम से ही जन्म लेते हैं, हमारी संतान हैं। तो हमें इनका सही मार्गदर्शन करना चाहिए। वरना यही विचार हमें महानता की पदवी भी दिलाती है और फांसी के फंदे तक भी ले जाती है।

dipression, sushant, death

guilt

यह विचार और अनुभव स्वतंत्र रूप से मेरे हैं।

कमेंट तक

तो लॉकडाउन का फीवर भी इस जेठ की दुपहरी पर चढ़ा हुआ था। अब माहौल का अंदाजा लगाना भी उतना ही उमस भरा है। ऑनलाइन क्लास के चोंचले, लॉग इन कर के बैठे थे। म्यूट कर के पैर पसार के बिल्कुल अलखरों की तरह ये 30 मिनट काटना था बस। ऊपर से नोटिफिकेशन सरक आया, और इस वक़्त यह बोरिंग साउंड भी लेक्चर से मीठी लग रही थी। इसलिए नजर डाली तो देखा किसी ने हमारी ब्लॉग के लगातार 3 4 कॉमेंट लाईक किए थे और साथ में उनका एक कमेंट भी था।

पता चला ओ तेरी ये स्टोरी https://wp.me/pav0oY-2v
कितनी पुरानी है चलो हम खुद भी एक बार पढ़ लें। उन शब्दों के साथ यादों कि एक बयार चली और स्किन से टकराते हीं मुझे कुछ एहसास करा गई। यार! ये हवाएं अच्छी तो हैं मगर इतनी गर्म क्यों हैं? जो जुबान बोल रही थी वो शरीर का जर्रा ज़र्रा भी महसूस कर रहा था।

आंखे मिचते हुए और एक लम्बी सांस लेते हुए कमेंट सेक्शन में पहुंचे, सोचा देखे तो इन महाशय ने तारीफ के कौन से शब्द भेजे हैं। आखिर एक लेखक चाहता हीं क्या है लोगों की अच्छी प्रतिक्रियाएं। मगर यहां कुछ और भी था जिससे अनजान थे हम।

30-32 कमेंट के बीच दो शब्दों का प्यार कोई और भी छोड़ गया था जो मेरी नजर में आज आया। पहले तो नाम देखकर ही ठिठक गए सोचा डिलीट कर दूं या रहने दूं? साथ ही थोड़ी खुशी थोड़ा खौफ चेहरे से सीने में उतरने लगा।

अब छुप छुप के जिसके बारे में लिखा जाय अगर उस की नजरों में आ जाए और उसका जवाब भी तो कैसा लगता है ये शायद हमने सोचा भी नहीं था।

मगर तसल्ली भी हुई कुछ अच्छा जवाब देख कर और शायद मन के किसी कोने से एक हल्की सी फुसफुसाहट भी हुई की शिवानी क्या हुआ? डर क्यों रही हो? कहानी ही तो है कौन सा कुछ हकीकत लिखा है? अब एक ही कहानी जो सिर्फ दो जन जानते हों फिर वो कहानी होती है या हकीकत मालूम नहीं।


http://कलम_बनारसी
इसे इग्नोर करते हुए हम उन महाशय के कमेंट तक पहुंचे जिनकी वजह से अभी हम खुद से छुपते हुए मुस्कुरा रहे थे।

रिप्लाई कर के हम फिर उन्ही दो शब्दों पर आ कर अटक गए। एक टक देखते देखते फिर से मुस्कुराया और दिल के एक कोने में दबी हुई एक पुरानी मोहबब्त फिर से पनप उठी।तब दिल के कोने से रीसते हुए मोहब्बत की एक मीठी चाशनी फिर से मुझे उन यादों के सीरे में धीरे धीरे लपेटने लगी।

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उद्योगपतियों की आन, मजदूरी का मान

जिन शहरों ने मजदूरों को धकिया कर निकाल दिया, पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने को मजबूर किया, भूखा रखा, बेघर कर दिया। उन्हें अब अहसास हो रहा है कि मजदूर उनके लिए कितना जरूरी हैं। यहां तक कि कर्नाटक सरकार ने ट्रेन रुकवा दी ताकि बिहार के मजदूर वहां से निकल न जाएं। इन्हें बेहतरी से मालूम है कि दिहाड़ी मजदूरों, अस्थाई मजदूरों का देश में इकनॉमी और इंडस्ट्री को चलने में कितना योगदान है।

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लॉकडाउन के शुरू होने के बाद से ही परेशान श्रमिकों एवं मजदूरों में पलायन की बढ़ती लालसा को देखकर कंपनी संचालकों में हड़कंप मच गया है। असल में इस डर कि वजह है श्रमशक्ति। क्योंकि श्रमशक्ति की कमी उद्योगों के लिए एक बड़ी संकट बन सकती है। और अगर मजदूर इस लॉक डाउन में सुरक्षित घर पहुंच गए तो इस बात की पूरी गारंटी है कि बिना कोरोना का संकट टले ये वापस नहीं आने वाले। जब तक सरकार ने लॉकडाउन में राहत नहीं दी थी, यानी इंडस्ट्री चालू करने की इजाजत नहीं दी थी, इन मजदूरों की किसी को फिकर नहीं थी।

गाजियाबाद जैसे बड़े औद्योगिक शहरों में कंपनियां खुल गई हैं। और वहां के मजदूर घर न जा पाने कि लाचारी और गरीबी के मारे कोरोना को खुलेआम दावत देने के लिए मजबूर हैं। और ऐसे में अगर वो सुरक्षित घर चले जाएंगे तो इन उद्योगपतियों का क्या होगा?

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इस विषय का इतना चिंताजनक होना लाजमी है क्योंकि इस वक़्त अपने मुल्क में दो लोग मिलकर देश चला रहे। पहला सरकार और दूसरे उद्योगपति।

यह देखकर अब तक शांत बैठे जिले के औद्योगिक इकाइयों के संचालकों की बेचैनी भी बढ़ गई है। जिले के अलग अलग औद्योगिक एसोसिएशन ने मिलकर एक साझा बयान भी जारी किया है, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मजदूरों को गांव न जाने की सलाह दी गई है।

एसोसिएशन की ओर से कहा गया है कि धीरे धीरे उद्यम शुरू होने लगे हैं। कंस्ट्रक्शन साइट भी चालू होने लगी हैं। इससे लोगों को रोजगार उपलब्ध होने लगा है।

अब सवाल ये है कि इस महामारी में लोगों को उनके रोजगार का हवाला देकर उन्हें बाध्य करने वाली सरकारें उनके स्वास्थ्य का कितना ख्याल रखती हैं। देश की इकनॉमी में मजदूरों की अहमियत का सवाल है और मलाल है कि सब जानते हैं कि मजदूर कितने जरूरी हैं लेकिन कोई उनकी कद्र नहीं करना चाहता।

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